अभिराजयशोभूषणम् में काव्यस्वरूप का समीक्षात्मक अनुशीलन
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर
प्रस्तुत शोध-पत्र में अभिराजयशोभूषणम् में प्रतिपादित काव्यस्वरूप का समीक्षात्मक अनुशीलन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अभिराज की काव्य-दृष्टि किसी एक प्राचीन काव्यशास्त्रीय सम्प्रदाय तक सीमित न होकर शब्द और अर्थ के साहचर्य, रसगर्भता, लोकोत्तरता, प्रतिभा, गुण, अलंकार, नवोन्मेष तथा आस्वादक की भूमिका को व्यापक धरातल पर समन्वित करती है। विशेषतः सहृदयास्वाद्य, कोविदास्वाद्य और लोकास्वाद्य—इस त्रिविध काव्य-विभाजन के माध्यम से अभिराज काव्य की सत्ता को केवल रचना तक सीमित न रखकर उसके ग्रहण और आस्वाद तक विस्तृत करते हैं। फलतः अभिराजयशोभूषणम् आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र में परम्परा और आधुनिकता के मध्य एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में सामने आता है।
त्रिपाठी, . (2026). अभिराजयशोभूषणम् में काव्यस्वरूप का समीक्षात्मक अनुशीलन. International Journal of Science, Strategic Management and Technology, 02(9), 1-9. https://doi.org/10.55041/ijsmt.v2i9.004
त्रिपाठी, गौरव. "अभिराजयशोभूषणम् में काव्यस्वरूप का समीक्षात्मक अनुशीलन." International Journal of Science, Strategic Management and Technology, vol. 02, no. 9, 2026, pp. 1-9. doi:https://doi.org/10.55041/ijsmt.v2i9.004.
त्रिपाठी, गौरव. "अभिराजयशोभूषणम् में काव्यस्वरूप का समीक्षात्मक अनुशीलन." International Journal of Science, Strategic Management and Technology 02, no. 9 (2026): 1-9. https://doi.org/https://doi.org/10.55041/ijsmt.v2i9.004.
- अभिराज राजेन्द्र मिश्र, अभिराजयशोभूषणम्, इलाहाबाद : वैजयन्त प्रकाशन, 2006; साथ ही सन्दीप कुमार द्विवेदी, “अभिराजयशोभूषणम् : एकं अभिनवं काव्यशास्त्रम्”, शोधशौर्यम इंटरनेशनल साइंटिफिक रेफरीड रिसर्च जर्नल, खण्ड 2, अंक 2, 2019, पृ. 262–272।
- भामह, काव्यालंकार, प्रथम परिच्छेद, कारिका 16 — “शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्।”
- दण्डी, काव्यादर्श, प्रथम परिच्छेद।
- वामन, काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, 1.2.6 — “रीतिरात्मा काव्यस्य।”
- आनन्दवर्धन, ध्वन्यालोक, प्रथम उद्योत; ध्वनि को श्रेष्ठ काव्य की प्रधान सत्ता के रूप में प्रतिपादित किया गया है
- कुन्तक, वक्रोक्तिजीवितम्, प्रथम उन्मेष।
- मम्मट, काव्यप्रकाश, प्रथम उल्लास; काव्य के शब्दार्थ, गुण, दोष तथा अलंकार सम्बन्धी विवेचन।
- विश्वनाथ कविराज, साहित्यदर्पण, प्रथम परिच्छेद, कारिका 3 — “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।”
- पण्डितराज जगन्नाथ, रसगङ्गाधर, प्रथम आनन — “रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्।”
- दिल्ली विश्वविद्यालय, संस्कृत विभाग, एम.ए. संस्कृत पाठ्यक्रम, आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र सम्बन्धी पाठ्यपत्र में अभिराजयशोभूषणम् का समावेश।